कब्र पर कहानियां

✍️ आकृति विज्ञा अर्पण

खेतों की कब्रों पर लिखी गयी एकांत कहानियां, जहाँ पर आकाश का सूनापन मन के खाली गमलों को धीरे—धीरे अपने जब्त में ले रहा हो, ठीक उसी तरह जिस तरह मैं महसूस कर पा रही हूँ अपनी मासूमियत के कब्र पर बनी अनुभूति की कड़वी परत जो आहिस्ता—आहिस्ता दरकची बातों को वक्त के पालिश से उस तरह चमका देगी जिस तरह इमारतें चमकती हैं और ठहराव भी चलायमान हो पड़े।

इमारतों में लगी खिड़कियां अक्सर खेतों को देखती हैं, नालों को देखती हैं और कमरे में आते—जाते मुखौटों को सड़क से कमरे तक अनेक रूपों में देखती हैं, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के सामने पंत पार्क में लगी पंडित गोविंद बल्लभ पंत की मूर्ति मुझे, तुम्हें, अनेक समाज सेवियों, ठेकेदारों, चोरों, बच्चों और अध्यापकों या फिर किसी को भी देखती रहती है निर्जिव बने हुए। उसी तरह बाबा गोरखनाथ भी देखते हैं करोड़ों श्रद्धालुओं को। सबकी मनौती, सबके आँसू, सबके जयघोष, सबकी विडंबना और सबकी आस्था सब बिल्कुल चुपचाप देखते हैं बाबा गोरखनाथ।

सरसों के फूल पे लगे माहों की तरह तमाम बातें एक सीजन भर उत्सव और परेशानी का सबब बनी कइयों ज़ह्नों का सफर कर मर भी सकती हैं या फिर Ram Prakash Bekhud सर जैसे लोगों की दृष्टि में आकर अमर भी हो सकती हैं। डिपेंड करता है वक्त और दृष्टि पर।

मैं क्या कह रही थी? हाँ, खेतों की कब्रों पर बनीं इमारतों में किचन गार्डन का चलन हुआ है उसी तरह जिस तरह अम्मा घर के पिछवारे धनिया, लहसून, जराकुश, केला, कोहड़ा, लउकी टमाटर, मर्चा लगवा देती थीं। लाल परदे वाली खिड़की के उस पार कोई आया आती हैं बच्चे की देख—रेख करने के लिये। वो ठीक वैसे ही मिसेज मेर्टन की बिटिया को पुचकारती हैं जिस तरह भक्तिन काकी हम भाई बहनों को पुचकारती थीं। आया आंटी को सीधे पल्ले की साड़ी में देखकर लगता है कि वो भी शायद “हमार सोना, हमार रतन, हमार परान ” ही कहती होंगी बाकी शब्द जो भी हों मतलब यही होता होगा।

हमारे एक घर में बीसन लोग एक चूल्हे का खाना खाते थे और अब एक इमारत में सैकड़ों परिवार सैकड़ों चूल्हें! समाकलन तो बढ़ा किंतु विभाजित गुच्छों में। वर्तमान के गर्भ में पलते भविष्य पर उस अतीत की परत चढ़ रही है यह देखकर मैं थोड़ी खुश हो जाती हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह उर्मिला को याद कर लक्ष्मण खुश हो जाते थे उतने ही वियोग के साथ।

वीरों के बसंत के बाद इमारतों का बसंत भी लिखा जाना ही है। कहीं सहेजी हुयी खानदानी कंगन पहने कोई बहू खीर बनाते दिख जाये या कोई बेटा माँ के बालों में सरसों का फूल लगाते दिख जाये तो तुम वहाँ पर “इमारतों का स्वर्णिम बसंत” की उपमा अंकित कर देना मेरी वाली मुस्कुराहट की टिकुली लगाकर।

(गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति विज्ञा अर्पण देस और खेत—खलिहानों से कहानियां निकालने का हुनर रखती हैं। उन्होंने अपनी यह रचना UNBIASED INDIA के साथ साझा की है।)
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