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ईद मुबारक (Eid Mubarak )

महक उठी है फ़ज़ा पैरहन की ख़ुशबू से

चमन दिलों का खिलाने को ईद आई है

  • मोहम्मद असदुल्लाह

यूं तो चांद हर रोज़ निकलता है पर जब दीदार ईद के चांद का होता है तो बात ही कुछ और होती है। सालों से दीदार ए चांद के साथ ईद की रौनक बढ़ जाया करती है। पर इस बार चांद भी आया और ईद भी, पर जैसा कि ज़फ़र इकबाल साहब कहते हैं-

तुझ को मेरी न मुझे तेरी ख़बर जाएगी

ईद अब के भी दबे पाँव गुज़र जाएगी

कोरोना की वबा ने वाकई ईद की रौनक में तब्दिलियां ला दी हैं। इस साल हम एक दूसरे को ईद मुबारक तो कह सकते हैं पर गले वर्चुअली ही मिलना होगा। इस बात से बहुत सारे लोग उदास हैं कि ईद पर इस बार पहली वाली रौनक नहीं है। हम एक दूसरे के घर नहीं जा पाएंगे। वो मीठी सेंवई की खुशबू इस बार अपने घर तक ही सिमट कर रह जाएगी।

वाकई कोरोना ने बदल तो बहुत कुछ दिया है, पर इसका मतलब ये थोड़ी है कि हम ईद मुबारक मुरझाए हुए चेहरे से कहेंगे। बल्कि हम तो वर्चुअली भी लोगों से मिलेंगे तो पूरे जोशोखरोश के साथ। क्या हुआ जो एक दूसरे के घर नहीं जा सकते, गले नहीं मिल सकते, सेंवई नहीं खिला सकते। पर दूर से ही अपने लफ्ज़ों की मिठास एक दूसरे तक पहुंचा सकते हैं। एक दूसरे को बता सकते हैं कि वो कितने ख़ास हैं जो दूर होते हुए भी पास हैं। गले मिलें न मिलें पर दिलों का मिलना बेहद ज़रुरी है और उसके लिए गले मिलना या मिलना ज़रुरी नहीं।

आइए ईद के इस मुबारक मौके पर अपनों से हर वो जज्बात, हर वो बात कह दें जो हमने उनसे कभी नहीं कहीं। रिश्तों में एक अलग मिठास घोलते हैं, कुछ इस तरह एक दूसरे से ईद मुबारक बोलते हैं।

शांभवी शुक्ला

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