अनुच्छेद 370 हटने के दो साल बाद किस हाल में हैं कश्मीरी पंडित?

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय हुए आज दो साल हो चुके हैं। आज ही के दिन यानी पांच अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले इस अनुच्छेद को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने निष्प्रभावी कर दिया था। इसी के साथ जम्मू-कश्मीर को दो प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटा गया। आज जम्मू कश्मीर से इस अनुच्छेद की विदाई के दो साल हो चुके हैं और ऐसे में यह सवाल हर किसी के मन में है कि इससे कश्मीर को क्या मिला। क्या उन कश्मीरी पंडितों को न्याय मिला जो इस अनुच्छेद के रहते इस्लामिक आतंकवाद का शिकार हुए थे और जान व इज्जत बचाने के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए थे? आखिर आज क्या हैं कश्मीर के हालात? क्या—क्या हुए हैं बदलाव, जानने के लिए पढ़िए यह रिपोर्ट…

छह हजार कश्मीरी पंडितों की वापसी

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा की मानें तो कश्मीरी पंडितों की कश्मीर घाटी में वापसी के लिए प्रयास जारी है। जल्द ही पहले चरण में छह हजार कश्मीरी पंडितों को नौकरी और इतनी ही संख्या में उन्हें आवास सुविधा दिए जाने का दावा सरकार ने किया है।

शादी करने पर स्थानीय निवासी का दर्जा

जम्मू-कश्मीर देश का हिस्सा होने के बावजूद यहां का निवासी होना उतना आसान कभी नहीं रहा, जितना दूसरे राज्यों में है। अनुच्छेद 370 प्रभावी रहने तक यहां की महिला से शादी करने के बाद भी न तो पति को स्थायी निवासी माना जाता था और न ही बच्चे को। लेकिन, अब इस नियम में बदलाव हुआ है। अब दूसरे राज्य के ऐसे पुरुष यहां के स्थानीय निवासी हो सकते हैं, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर की लड़की से शादी की हो।

गैर कृषि जमीन खरीदना संभव

370 होने की स्थिति में जम्मू—कश्मीर में कोई बाहरी जमीन नहीं खरीद सकता था। लेकिन अब, घाटी से बाहर के लोग भी कश्मीर में गैर-कृषि योग्य जमीन खरीद सकते हैं। हालांकि कृषि योग्य जमीन अभी भी सिर्फ जम्मू—कश्मीर के लोग ही खरीद—बेच सकते हैं।

इमारतों पर तिरंगा

दिल को सबसे कचोटने वाली बात जो थी, वह यह थी कि जम्मू—कश्मीर में 370 होने तक वहां का अपना झंडा होता था। तिरंगे की शान में वहां गुस्ताखी आम बात थी। लेकिन 2019 में अनुच्छेद—370 हटाए जाने के 20 दिन बाद श्रीनगर सचिवालय से जम्मू-कश्मीर का झंडा हटाकर वहां तिरंगा फहराया गया। उसके बाद अब सभी सरकारी कार्यालयों और संवैधानिक संस्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।

पत्थरबाजों की खैर नहीं

जम्मू—कश्मीर में पत्थरबाज बड़ी समस्या रहे हैं। लेकिन, केंद्र सरकार ने अब उनकी भी हालत दुरुस्त की है। हाल ही में सरकार ने आदेश जारी किया है कि पत्थरबाजी और दूसरी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों को पासपोर्ट जारी नहीं किया जाएगा। इतना ही नहीं, सरकारी नियुक्तियों के लिए सुरक्षा एजेसियां उन्हें हरी झंडी नहीं देगी। उम्मीद है कि इससे पत्थरबाजों का दुस्साहस कम होगा।

पंचायत और बीडीसी चुनाव

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लेने के बाद वहां सत्ता के विकेंद्रीकरण का भी प्रयास तेज किया है। इसके तहत वहां पहले पंचायत चुनाव कराए गए और फिर बीडीसी चुनाव भी संपन्न हुए।

शेख अब्दुल्ला के जन्मदिन पर अवकाश नहीं

2019 से पहले हर साल पांच दिसंबर को जम्मू—कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के जन्मदिन पर सार्वजनिक अवकाश रहता था। लेकिन, 2019 के बाद न सिर्फ इस पर रोक लगी, बल्कि शेख अब्दुल्ला के नाम वाली कई सरकारी इमारतों के नाम भी बदल दिए गए।

परिसीमन की प्रक्रिया

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के साथ ही इसे दो राज्यों में बांटा गया था। लिहाजा, नए सिरे से इसका परिसीमन जरूरी है। इस समय जम्मू-कश्मीर विधानसभा क्षेत्र के परि​सीमन की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। माना जा रहा है कि इसके बाद घाटी में आने वाली सात सीटें जम्मू में चली जाएंगी। जाहिर हैं कि इसका यहां की राजनीति पर भी असर देखने को मिलेगा।

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