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मासूमियत को कैसे हासिल हो हक़ ?

World Day Against Child Labour Special Story

उनकी हथेलियों की लकीरें कहीं छिप गई हैं
आंखों की चमक भी कुछ ढंकी ढंकी सी है
खेलते नहीं दिखते वो बच्चे
क्योंकि बचपन में ही दफ्तर जाने लगते हैं वो बच्चे।

हां, वो बच्चे जो सड़कों पर किसी कार के रुकते ही करतब दिखाने लगते हैं तो कभी कार के शीशे चमकाने की होड़ में नज़र आते हैं। कभी किसी होटल, ढाबे या रेस्तरा पर बर्तन धोते , मालिक से गालियां खाते भी तो नज़र आ जाते हैं ये बच्चे। जिन्हें अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं हम। पर जानते हैं दोस्तों, आज कौन सा दिन है? आज है ‘World Day Against Child Labour’, बोले तो विश्व बालश्रम दिवस। यानी आज हम सभी को दिन भर सोशल मीडिया पर पोस्ट डालनी है कि बच्चों से काम मत कराइये। पर जनाब, ज़रा ये तो बताइए कि ये जो बच्चे काम कर रहे हैं, या जिनसे काम लिया जा रहा है, उनके सामने आपने विकल्प क्या छोड़ा है?

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रही कि बच्चों से काम लेना या उनका काम करना ठीक है, पर यहां ये ध्यान देना जरूरी है कि आखिर वो क्या हालात हैं कि इन बच्चों को घर से निकलने पर मजबूर होना पड़ा। आखिर क्यों बचपन को वक्त से पहले ही जवान होना पड़ा। उस हालात का नाम है गरीबी। क्योंकि जब पेट रोटी मांगता है तो अचानक बचपन को बड़ा होना ही पड़ता है। जैसे हमारे देश क्या विश्व के तमाम बच्चे हो गए। ऐसे में कोशिश ये होनी चाहिए कि अशिक्षा और गरीबी से भरे हालातों से इन्हें बाहर निकाला जाए। इन्हें नहीं इनके माता पिता को समझाया जाए कि मेहनत किसे करनी चाहिए और कौन कर रहा है।
वैसे ये बच्चे जो बाल मजदूर कहलाते हैं, इनके मेहनत की कीमत बड़ी कम आंकी जाती है। मालिक की जेब पर असर कम पड़ता है इसलिए भी इन बच्चों को काम पर आसानी से रखा जाता है। पर अगर कानून की बात की जाए तो जेब पर असर कम करने का चक्कर ख़ासा महंगा पड़ सकता है।

बाल श्रम पर बनें क़ानून की बात की जाए तो संशोधित अधिनियम में बालश्रम कराने पर-
• छह महीने से लेकर दो साल तक सज़ा का प्रावधान।
• 20 हजार से लेकर 50 हजार तक का जुर्माना
• पहले तीन महीने में एक साल तक की सज़ा, और
• 10 हजार से लेकर 20 हजार तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
• दूसरी बार अपराध में संलिप्त पाए जाने पर एक साल से तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है।
• आपको बता दें कि स्कूल के बाद के समय में अपने परिवार की मदद करने वाले बच्चे इस कानून के दायरे में नहीं हैं। साथ ही टेलीविज़न, विज्ञापन या फिल्मों में काम करने वाले बच्चे भी इस दायरे से बाहर है।
• इस कानून के तहत 14 से 18 साल की उम्र के किशोर को खानों और दूसरे ज्वलनशील पदार्थ या विस्फोटकों जैसे जोखिम वाले काम करने पर पाबंदी है।
कानून सख्त है पर ज़िंदगी कई बार उससे भी ज्यादा सख्ती दिखाती है और ये मासूम बच्चे मजबूरी में चुनते हैं घर से बाहर निकलकर काम करने की राह और कहलाने लगते हैं बाल मजदूर। कोशिश कीजिए अगर किसी एक भी बच्चे की शिक्षा या दूसरी ज़रुरतें आप पूरी कर सकें, या किसी भी तरह से मदद कर सकें तो विश्वास मानिए सही मायनों में ये दिन सार्थक हो जाएगा।

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