रिश्ते में तो हम तुम्हारी दीदी लगते हैं… नाम है ‘ममता’ | Bengal Election Result 2021

… तो क्या हुआ जो पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम सीट से सबकी दीदी यानी ममता बनर्जी हार गईं। वो कहते हैं न हारकर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं। 2021 के पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भले ही ममता बनर्जी अपनी सीट हार गईं लेकिन टीएमसी ने जो ऐतिहासिक जीत दर्ज की है वो ये बताने के लिए काफी है कि बंगाल की शेरनी को हराना या डिगाना कितना मुश्किल है। हां, वो अलग बात है कि बंगाल में बीजेपी की जीतोड़ मेहनत भी उसे सत्ता दिलाने में नाकाम रही और इस दर्द पर पार्टी इस बात से मरहम लगा सकती है कि कम से कम नंदीग्राम जैसी हाईप्रोफाइल सीट पर सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को हरा दिया है।

जीत के बाद दीदी के पैरों का प्लास्टर हट गया और अपने चिर-परिचित अंदाज़ में दीदी ने कहा- जय बंगाल, बंगाल ही कर सकता है। साथ ही उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से घर लौटने और मास्क लगाकर रहने की अपील भी की। इसके साथ ही टीएमसी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर नंदीग्राम में दोबारा मतदान कराने की अपील की है। ख़ैर, फिलहाल ये साफ है कि टीएमसी ने जीत की हैट्रिक के साथ बीजेपी के विजयरथ को रोक दिया है।

तो आइए आज हम आपको सबकी दीदी यानी ममता बनर्जी के बारे में कुछ ख़ास बातें बताते हैं।

  • 5 जनवरी 1955 को जन्मीं ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री हैं।
  • 1984 में उन्होंने पहली बार जाधवपुर लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की और कांग्रेस में शामिल हुईं।
  • 1997 में उन्होंने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की।
  • ममता बनर्जी दो बार रेलमंत्री रहीं।
  • 2011 और 2016 के चुनाव में भारी बहुमत के साथ वे पश्चिम बंगाल की सीएम बनीं।
  • ममता बनर्जी का साहित्य और कला से बेहद जुड़ाव है। 2018 में ममता बनर्जी ने दुर्गा पूजा पर आधारित एल्बम ‘रौद्रर छाया’ के लिए सात गीत कंपोज किए हैं।
  • दीदी कविताएं भी लिखती हैं। इसके अलावा उन्हें पेंटिंग का बेहद शौक है। अब तक वे अपनी 300 पेंटिग्स बेच चुकी हैं।
  • दीदी अपने ज़ायके को लेकर काफी सजग रहती हैं। तेल और मसालेदार खाने से परहेज करती हैं। फूला हुआ चावल, चाय और चॉकलेट दीदी को पसंद है। इसके साथ कुछ ख़ास मौके पर आलू के तले हुए पकौड़े भी दीदी के खाने की प्लेट में जगह पा लेते हैं।
  • सादा जीवन उच्च विचार को मानने वाली दीदी जो एकरंगा बॉर्डर वाली सूती साड़ियां पहनती हैं वो धनखली में बनती हैं।
  • ममता बनर्जी रोज़ पांच से छह किलोमीटर पैदल ज़रुर चलती हैं।
  • प्रकृति से बेहद जुड़ाव रखने वाली ममता बनर्जी को जब भी वक्त मिलता है वे हिमालय की तलहटी और मेदिनीपुर के जंगलों में ज़रुर जाती हैं।

ममता बनर्जी बिल्कुल सादगी से रहती हैं पर उनकी ज़िंदगी के कैनवास पर आम से लेकर ख़ास तक, सियासत से लेकर संस्कृति तक, तमाम रंग बिखरे हुए हैं। दीदी के अंदाज़ और उनकी कविताओं के कायल विरोधी भी रहे हैं। और अब जब जीत की हैट्रिक के साथ तीसरी बार ममता बनर्जी की ताजपोशी बतौर सीएम होने जा रही है तो सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक एक ही गूंज है …

दीदी! ओ दीदी!

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