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श्री वृंदावन धाम… यही तो है राधा रानी का निवास

धन-धन वृन्दावन रजधानी।
जहाँ विराजत मोहन राजा श्री राधा महारानी।
सदा सनातन एक रस जोरी महिमा निगम ना जानी।
श्री हरि प्रिया हितु निज दासी रहत सदा अगवानी॥

प्रेम मन्दिर, वृन्दावन

विश्व के सभी स्थानों में श्री धाम वृन्दावन का सर्वोच्च स्थान माना गया है। इस धाम की महिमा वही समझ सकता है, जिसपर ब्रजरानी श्री राधारानी की कृपा बरसती है।
वृन्दावन का आध्यात्मिक अर्थ है- “वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं”। तुलसी का विषेश वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन ब्रज का हृदय है, जहाँ प्रिया-प्रियतम ने अपनी दिव्य लीलाएं की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है।

रसिकों की राजधानी
वृन्दावन रसिकों की राजधानी है। यहाँ के राजा श्यामसुन्दर और महारानी श्री राधिका जी हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। वृन्दावन श्यामसुन्दर की प्रियतमा श्री राधिका जी का निज धाम है। यहाँ के कण-कण में भक्तिरस है।

सभी धामों से ऊपर
वृंदावन के बारे में कहा जाता है- “वृन्दस्य अवनं रक्षणं यत्र तत वृन्दावनं” जहाँ श्री राधारानी अपने भक्तों की दिन-रात रक्षा करती हैं, उसे वृन्दावन कहते हैं। सभी धामों से ऊपर है ब्रज धाम और सभी तीर्थों से श्रेष्ठ है श्री वृन्दावन।

वृन्दावन की महिमा का बखान करता एक प्रसंग है-
भगवान नारायण ने प्रयाग को तीर्थों का राजा बना दिया। अतः सभी तीर्थ प्रयागराज को कर देने आते थे। एक बार नारद जी ने प्रयागराज से पूछा- “क्या वृन्दावन भी आपको कर देने आता है?” तीर्थराज ने नकारात्मक उत्तर दिया। तो नारद जी बोले- “फ़िर आप तीर्थराज कैसे हुए।” इस बात से दुखी होकर तीर्थराज भगवान नारायण के पास पहुँचे। भगवान ने प्रयागराज के आने का कारण पूछा। तीर्थराज बोले- “प्रभु! आपने मुझे सभी तीर्थों का राजा बनाया है। सभी तीर्थ मुझे कर देने आते हैं, लेकिन श्री वृन्दावन कभी कर देने नहीं आए। अतः मेरा तीर्थराज होना अनुचित है।” भगवान ने प्रयागराज से कहा- “तीर्थराज! मैंने तुम्हें सभी तीर्थों का राजा बनाया है। अपने निज गृह का नहीं। वृन्दावन मेरा घर है। यह मेरी प्रिया श्री किशोरी जी की विहार स्थली है। वहाँ की अधिपति तो वे ही हैं। मैं भी सदा वहीं निवास करता हूँ। वह तो आप से भी ऊपर है। एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे। चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रिनाथ घूम आओगे॥ कोटि बार काशी, केदारनाथ रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे। होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥

मनोहारी छवि
वृन्दावन की छवि प्रतिक्षण नवीन है। आज भी चारों ओर आराध्य की आराधना और इष्ट की उपासना के स्वर हर क्षण सुनाई देते हैं। कोई भी अनुभव कर सकता है कि वृन्दावन की सीमा में प्रवेश करते ही एक अदृश्य भाव, एक अदृश्य शक्ति हृदय स्थल के अन्दर प्रवेश करती है और वृन्दावन की परिधि छोड़ते ही यह दूर हो जाती है।

भगवान की देह है वृन्दावन

वृन्दावन को भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं अपने श्रीमुख से अपना श्रीविग्रह (देह) कहा है। “पंचयोजनमेवास्ति वनं मे देह रूपकम” इसमें जो वास करता है, भगवान की गोदी में ही वास करता है। परन्तु, श्री राधारानी की कृपा से ही यह गोदी प्राप्त होती है। “कृपयति यदि राधा बाधिता शेष बाधा” भगवान ने अपने श्रीमुख से यहाँ तक कहा है कि यह रमणीय वृन्दावन मेरा गोलोक धाम ही है- “इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम” तो व्रज की महारानी श्री राधारानी हम पर ऐसी कृपा करें कि हमें श्रीवृन्दावन धाम का वास मिले और एक बार उस छवि का दर्शन मिल जाये जिसे देखने के लिये भक्त पागल हो जाते हैं।

इतना कहते हुए श्रीधाम वृन्दावन को मैं कोटि-कोटि नमन करती हूँ।
धन वृन्दावन धाम है,
धन वृन्दावन नाम।
धन वृन्दावन रसिक
जो सुमिरै श्यामा श्याम।।
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