इस वक्त देश बड़े ही मुश्किल दौर से गुजर रहा है। जी नहीं….मैं कोरोना की बात नहीं कर रही हूं। मैं बात कर रही हूं देश में चल रहे भारत-चीन सीमा विवाद की। हम सभी के लिए जरूरी है यह जानना कि आखिर भारत और चीन में यह तनातनी है क्यों? क्योंकि किसी भी विवाद का हल जानने के लिए जरूरी है कि पहले विवाद की वजह जानी जाए।

भारत-चीन सीमा विवाद यूं तो काफी समय से चलता आ रहा है, लेकिन इस वर्ष 5 मई को इसने एक बार फिर तूल पकड़ लिया, जब चीनी सैनिकों ने भारत के इलाके में प्रवेश किया। बता दें कि भारत और चीन की सीमा लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) से अलग होती है। दरअसल, यही एलएसी विवाद की वास्तविक जड़ है।

पहले एलएसी समझिए

भारत और चीन ने अपने-अपने हिसाब से एलएसी को तय किया है। भारत के अनुसार एलएसी कहीं और है तो चीन के लिए कुछ और। इस कारण दोनों देशों के एलएसी के बीच एक खाली जगह यानी ग्रे एरिया बन गया है। इसे एडीपीए यानी एरिया ऑफ डिफरिंग परसेप्शन कहा जाता है। हालांकि, इस क्षेत्र की बात करें तो यह उतना बड़ा भी नहीं है। लद्दाख के पैंगोंग झील में देखें तो यह लगभग मात्र 10 किलोमीटर का क्षेत्र है। लेकिन, विवाद के लिए तो एक इंच जगह भी काफी होती है, हां तो 10 किलोमीटर का क्षेत्र है…!

अब समझिए कि दिक्कत कहां है?

एडीपीए में भारत और चीन दोनों देश के जवान सिर्फ पेट्रोलिंग करने के लिए जाया करते थे। लेकिन, धीरे—धीरे चीन की कोशिश है कि इस एरिया में पूरी तरह उसका कब्जा हो जाए। इसके लिए वह समय—समय पर कोशिश करता रहता है। एक बार फिर पिछले दिनों चीनी सैनिक लद्दाख के पैंगोंग झील में भारत के आधिपत्य वाले ग्रे एरिया में घुसने लगे, और वहां पहुंचकर अपना खूंटा गाड़ने की कोशिश करने लगे। इतना ही नहीं, चीन के सैनिकों ने लद्दाख की गलवान घाटी और कोंगका दर्रा के हॉट स्प्रिंग इलाके में भी घुसपैठ करने की कोशिश की है। इसी बीच यह खबर राहत देने वाली है कि चीनी सेना अब इस क्षेत्र से पीछे हट चुकी है।

… तो अब कोई खतरा नहीं?

इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले आपको सुकून देने वाला एक दृश्य याद दिलाते हैं। आपने थ्री इडियट फिल्म तो देखी ही होगी। जरूर देखी होगी। … तो 2009 में इस फिल्म के कई खूबसूरत दृश्य पैंगोंग झील में कैद​ किए गए थे। इस झील की लंबाई पश्चिम से पूर्व की तरफ लगभग 135 किमी है। इसी से होकर भारत और चीन की सीमाएं गुजरती हैं। झील में पश्चिम से पूर्व तक आठ चोटियां हैं, जिसे फिंगर कहा जाता है। दोनों देशों के फिंगर पहले से ही निर्धारित हैं कि कौन कहां तक पेट्रोलिंग कर सकता है।
यहां तक स​बकुछ ठीक है लेकिन चीन इतने से संतुष्ट कभी नहीं रहा। वह अक्सर अपने निर्धारित फिंगर के बाहर पेट्रोलिंग ही नहीं, ​बल्कि कब्जा करने की कोशिश करता है। हालिया बवाल भी इसी क्रम में हुआ, जिसे अब सुलझा लिए जाने का दावा किया जा रहा है। कुछ खबरें चल रही हैं कि छह जून को दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की बात-चीत हुई और अब दोनों देशों के बीच तनाव कम हो गया है। लेकिन क्या तनाव कम हो जाना किसी मामले का सुलझ जाना होता है? क्या चीन ने ऐसा कुछ कहा कि अब कोई विवाद नहीं है? फिर विवाद सुलझा कैसे? जाहिर है कि विवाद टला है आगे लिए, जैसा कि हमेशा होता रहता है; सुलझा हरगिज नहीं है।

अब राजनीति समझिए

दो देशों की सीमाएं जितनी आड़ी—तिरछी और विवादास्पद होती हैं न, उससे कई गुना ना समझ में आने वाली चीज इन देशों की राजनीति होती है। माने एक लाइन में कहा जाए तो दो देशों की सीमा को समझने से कहीं ज्यादा मुश्किल है उस पर दोनों देशों में होने वाली राजनीति को समझना। भारत की बात करें तो चीन से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आया है कि देश बिल्कुल सुरक्षित है और चीन के साथ सीमा विवाद से देशवासियों को डरने की जरूरत नहीं है। देश सुरक्षित है का आश्वासन क्या यह आशंका भी पैदा नहीं करता कि देश असुरक्षित था क्या? देशवासियों को डरने की जरूरत नहीं है का क्या मतलब है? क्या, रक्षामंत्री को पता है कि देशवासी डरे हुए हैं? और यदि डरे हुए हैं तो क्यों? क्या सिर्फ यह कह देने से कि डरने की जरूरत नहीं है, किसी का डर चला जाता है? नहीं ना! सुरक्षा का अहसास होने और डर खत्म होने के लिए जरूरी है कि हम सुनिश्चित हों कि हम सामने वाले से अधिक ताकतवर हैं। लेकिन, हकीकत यही है कि हम एक—दो नहीं, कई मोर्चों पर चीन के सामने दूर—दूर तक नहीं ठहरते। एक तरफ चीन वैश्विक महाशक्ति बन चुका है तो दूसरी तरफ भारत अभी आत्मनिर्भरता का नारा ही गढ़ रहा है। आज भी चीन पर भारत की अर्थव्यवस्था चीन की अपेक्षा चार गुना ज्यादा निर्भर है। भारत के नेतृत्व के पास चीन को न तो सबक सिखाने का सामथ्र्य है और न ही समझाने की समझ। ऐसे में, नेताओं के लिए आसान है देश के नागरिकों को समझा देना और कह देना कि डरने की कोई जरूरत नहीं है।

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