धोनी को तो तभी संन्यास ले लेना चाहिए था जब…

✍️ सुबोध झा

2006 में जब महेंद्र सिंह धोनी ने भारतीय क्रिकेट टीम में अपना स्थान पक्का किया ही था तभी मैंने कहा था कि निश्चय ही यह खिलाड़ी आगे चलकर कप्तान बनेगा और भारतीय क्रिकेट को नई बुलंदियों पर ले जाएगा। बात शाम में हो रही थी इसलिए लोगों ने मेरी भविष्यवाणी को हँसी में उड़ा दिया। लेकिन 2007 में प्रथम T20 विश्व कप में भारत की अगवानी करने के लिए धोनी को चुना गया और उसके बाद की सारी बातें इतिहास में दर्ज हैं।

मैं 2019 तक धोनी का अनुसरण करता रहा और उन्हीं के कारण क्रिकेट का भी। 2019 विश्वकप के सेमीफाइनल मुकाबले में उनके रन आउट होने पर मेरा दिल भी टूटा था। उनके मैदान में रहने तक मुझे यह भरोसा था कि हम किसी भी प्रकार यह मुकाबला जीतकर फाइनल में प्रवेश कर जाएँगे। धोनी अश्रुपूरित नयनों के साथ मैदान से बाहर आए, यह दृश्य हृदय विदारक था। मेरे कई मित्रों ने इस हार का ठीकरा धोनी के सिर फोड़ा, चयनसमिति ने भी धोनी को ही बलि का बकरा बनाया। मुझे समझ आ चुका था कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में यह धोनी का आखिरी मैच था। मुझे यह नहीं समझ आ रहा कि धोनी ने यह घोषणा करने में इतना लंबा समय क्यों लिया?

कोरोना के फैलने के बाद क्रिकेट की दुनिया अब पहले जैसी होने नहीं जा रही और धोनी के संन्यास लेने के बाद मेरे पास भी अब आगे से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट देखने का कोई कारण नहीं है। मैं धोनी के रिटायर होने तक IPL देखूँगा। मैं धोनी को अलविदा नहीं कर रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहकर अपने अंतिम क्रिकेट हीरो धोनी के साथ आईपीएल की ओर जा रहा हूँ! अलविदा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट! मैं धोनी का अनुसरण करने को चुनता हूँ!

(पेशे से बैंकर सुबोध झा की समसामयिक घटनाओं में दिलचस्पी रहती है। साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले सुबोध अपनी बात कभी लेख तो कभी शेरो—शायरी के माध्यम से प्रकट करते हैं। महेंद्र सिंह धोनी के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने पर सुबोध झा ने अपने दिल की बात लेख के माध्यम से UNBIASED INDIA के साथ साझा किया है।)

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