एक किरदार जिसके डायलॉग आने वाली जाने कितनी सदियों के लिए मील का पत्थर साबित होंगे। अपनी आवाज़ और अंदाज़ से राजा लगने वाले कलाकार, जिनका नाम है राजकुमार। उन्होंने 3 जुलाई 1996 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा और हम सभी की यादों में हमेशा के लिए बस गए। 

… तो आइए आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर डायलॉग किंग को उनके डॉयलॉग्स के ज़रिए ही याद किया जाए।

हम आंखो से सुरमा नहीं चुराते। हम आंखें ही चुरा लेते हैं।
फ़िल्म ‘तिरंगा’

दादा तो इस दुनिया में दो ही हैं। एक ऊपर वाला और दूसरा मैं।
फ़िल्म ‘मरते दम तक’

हम तुम्हें वह मौत देंगे जो न तो किसी कानून की किताब में लिखी होगी और न ही किसी मुजरिम ने सोची होगी।
फ़िल्म ‘तिरंगा’

हम तुम्हें मारेंगे और जरूर मारेंगे। लेकिन वह वक्त भी हमारा होगा। बंदूक भी हमारी होगी और गोली भी हमारी होगी।
फ़िल्म ‘सौदागर’

चिनॉय सेठ, जिनके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते।
फ़िल्म ‘वक्त’

काश कि तुमने हमे आवाज दी होती तो हम मौत की नींद से भी उठकर चले आते।
फ़िल्म ‘सौदागर’

आपके पैर बहुत खूबसूरत हैं। इन्हें ज़मीन पर मत रखिए, मैले हो जाएंगे।
फ़िल्म ‘पाकीजा’

बाजार के किसी सड़क छाप दर्जी को बुलाकर उसे अपने कफन का नाप दे दो।
फिल्म ‘मरते दम तक’

जानी! ये बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं है, हाथ कट जाए तो खून निकल आता है।
फिल्म ‘वक्त’





राजकुमार साहब का एक डायलॉग है ‘हवाओं के टकराने से पहाड़ों में सुराख नहीं होते’ तो इस पर हमारा जवाब है कि ‘आपने कैसे सोचा कि हम आपको भूल जाएंगे, जानी… आपकी आवाज़ और अंदाज़ हम सालों अपने दिलों में ज़िंदा रखेंगे।’
क्यों मैंने ठीक कहा न? क्योंकि कलाकार कभी नहीं मरते। कभी नहीं, मतलब कभी भी नहीं।

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