हिचकी | फिल्म तो देखी आपने मगर सीखा क्या?

Developmental Language Disorder Awareness Day Special

साल 2018 में रानी मुखर्जी की एक फिल्म आई थी हिचकी, जिसमें रानी मुखर्जी टोरैटे सिंड्रोम से जूझती नज़र आती हैं। पर आज मैं बात रानी मुखर्जी या फिर इस फिल्म के बारे मे नहीं करने वाली। न मैं आपसे कहूंगी की तारे ज़मीन पर फिल्म याद है आपको? जिसमें एक छोटा सा बच्चा डिस्लेक्सिस से पीड़ित है पर उसकी परेशानी कोई समझ ही नहीं पाता। आज मैं आपसे बात करना चाहती हूं बच्चों में Language Delay की समस्या के बारे में, क्योंकि आज है Developmental Language Disorder Awareness Day.

मैं एक एक शिक्षिका भी हूं, इसलिए मुझे बहुत सारे बच्चों को बेहद करीब से देखने का मौका मिलता है। आए दिन अभिभावकों से ये भी सुनने को मिलता है कि मेरा बच्चा दूसरे बच्चों जैसा आखिर क्यों नहीं है? ये ठीक से बोलता क्यों नहीं या बोलता ही क्यों नहीं? कई बार पैरेंट्स ज़बरदस्ती बच्चे से बुलवाने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार तो कुछ चीज़ें extreme हो जाती हैं जिनका ज़िक्र मैं नहीं करना चाहती, क्योंकि कई बार कुछ अनचाही बातों का ज़िक्र मुद्दे से भटका देता है।
अगर आपका बच्चा ठीक से नहीं बोलता, या फिर उम्मम, हम्मम जैसे शब्दों से काम चलाता है या फिर बिल्कुल ही नहीं बोलता तो हो सकता है कि वो Language Disorder की समस्या से जूझ रहा हो। ये परेशानी कई बार Genetic reasons से होती है तो कई बार Autism या फिर सुनने में परेशानी भी इसका कारण हो सकती है।

ऐसे में आपको कुछ बातों का ध्यान देना है।

  • अगर आपका बच्चा साल भऱ का है और वो आपकी बातों पर ठीक से response नहीं देता तो एक बार अपनी पीडियाट्रिशन से consult ज़रुर करें। साल भर के बच्चे छोटे छोटे शब्द बोलने लगते हैं या फिर कोशिश करने लगते हैं।
  • एक साल से दो साल की उम्र के बच्चे शब्दों को जोड़कर जैसे मां, पानी दो, खाना दो जैसे वाक्य बोलने लगते हैं।
  • तीन साल या उससे ज्यादा उम्र के बच्चे लंबे वाक्य, कहानियां या फिर गाने सुनाने लगते हैं।
  • अगर आपका बच्चा बोलने की कोशिश भी नहीं कर रहा या बिल्कुल ही नहीं बोल रहा तो किसी speech Therapist या फिर Pediatrician से बात ज़रुर करें।
  • सभी को Me Time की ज़रुरत होती है, पर इसके लिए भूल से भी बच्चे को फोन या टीवी में न उलझाएं। ऐसा करके आप अनजाने ही उसकी लाइफ को बहुत सारी उलझनों से भर देते हैं। कोशिश कीजिए की टीवी या फिर फोन का एक टाइम सेट हो।
  • अपने बच्चे से बातें कीजिए। याद रखिए बच्चे के पहले शब्द से लेकर उसकी पहचान शब्दकोष से कराने की ज़िम्मेदारी आपकी है।
  • कभी भी अपनी उम्मीद या patience को खत्म मत होने दिजिए। क्योंकि आपका बच्चा किसी भी परेशानी में हो, आपका साथ ही उसमें आत्मविश्वास जगा पाएगा।
  • कभी भी इस बारे में बात करने से हिचकिचाइए मत। जैसे सर्दी, जुकाम हम किसी से नहीं छिपाते या फिर शर्मिंदा नहीं होते तो Language Disorder पर भी आपको शर्मिंदा होने या घबराने की ज़रुरत नहीं , बल्कि कोशिश ये करनी है कि आप उस समस्या का समाधान कर सकें। अपने बच्चे की ताकत बन सकें।

एक बात हमेशा याद रखिए कि दुनिया में कोई भी ऐसी समस्या नहीं जिसका हल न हो, अब देखिए न IMPOSSIBLE को ही जब तोड़कर लिखते हैं तो वो I M POSSIBLE बन जाता है। तो विश्वास रखिए कि भले ही आपका बच्चा दूसरे बच्चों से थोड़ा अलग है तो वो कुछ अलग करके भी दिखाएगा।
अल्बर्ट आइन्सटीन के बारे में तो सुना ही होगा न आपने? उन्हें भी दुनिया अलग मानती थी, क्योंकि 6 साल की उम्र तक वो बोले ही नहीं थे और अलग थलग रहते थे। लेकिन जो उन्होंने किया वो भी तो सबसे अलग था न।
तो बस ठान लीजिए कि अपने बच्चे को डांटने मारने की जगह पहले ये कोशिश करनी है कि अगर वो बोल नहीं रहा तो क्यों, अगर वो सही बर्ताव नहीं कर रहा तो क्यों… बिना क्यों का जवाब जाने किसी निष्कर्ष तक पहुंचना किसी भी हाल में सही नहीं।
तो कोशिश ये होनी चाहिए कि बच्चे को अगर हिचकी आए तो पानी दिया जाए, न कि उसे हड़काया जाए कि उसने हिचकी क्यों ली? समझ गए ना?

… और हां, इसी तरह की नई बातें जानने—सीखने—समझने के लिए UNBIASED india पर पढ़ते रहिए SUNDAY with SHWETA.

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