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मैं ज़िंदगी का दीया जलाती हूं!

जिंदगी को जब मैं अपने रंग दिखाती हूँ,वो दीया बुझाती हैं, मैं दीया जलाती हूं! मैं उदास रातों में ढूंढ़ती हूं ख़ुद को ही,जब कहीं नही मिलती, थक के सो जाती हूँ! कुछ नजर नहीं आता मुझे अँधेरे में,कौन है जिसे अपनी उंगलियां थमाती हूँ! खुशबू आती है, जिसके पास आने से,जानती नहीं लेकिन रोज

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चाहतों को मुख्तसर कर दिया…

सारी दुनियां से ही बेखबर कर दिया,उसने मुझपे ये कैसा असर कर दिया। कर दिया बूंद को वो समंदरऔर मेरी चाहतों को मुख्तसर कर दिया। जगाई है मुझमें ऐसी मुहब्बत,मुहब्बत को दिल का डगर कर दिया। जाने क्या बात उसमें थी,दिल को मेरे वो अपना घर कर दिया। उसमें दिखने लगा नूर रब का,हर दुआ

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