शाबाश

डॉ. अरविंद : कलयुग का सारथी

गुमसुम सी हैं शहर की गलियां, गुम सी हैं मासूमों की मस्तियां, मुक्त हो गगन में उड़ते पंछी भी हैं हैरान कि आखिर घरों में क्यों कैद है हर इंसान। किसी को नहीं पता कि आखिर कब आएगी वो सुबह जब एक बार फिर सब बिना किसी डर के घर से बाहर निकल पाएंगे। अपनों

error: Content is protected !!