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अजीब सी चाहत है मेरी…

बड़ी अजीब चाहत है मेरी,जहाँ नहीं होता कुछ भीमैं वहीँ सबकुछ पाना चाहती हूँ, वहीं पाना चाहती हूँमैं अपने सवालो के जवाबजहाँ लोग बर्षो से चुप हैं, चुप हैं किउन्हें बोलने नहीं दिया गयाचुप हैं किक्या होगा बोलकरचुप हैं किवे चुप्पीवादी हैं, मैं उन्ही आंखों मेंअपने को खोजती हूंजिनमें कोई भी आकृतिनहीं उभरती, मैं उन्हीं

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