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अजीब सी चाहत है मेरी…

बड़ी अजीब चाहत है मेरी,जहाँ नहीं होता कुछ भीमैं वहीँ सबकुछ पाना चाहती हूँ, वहीं पाना चाहती हूँमैं अपने सवालो के जवाबजहाँ लोग बर्षो से चुप हैं, चुप हैं किउन्हें बोलने नहीं दिया गयाचुप हैं किक्या होगा बोलकरचुप हैं किवे चुप्पीवादी हैं, मैं उन्ही आंखों मेंअपने को खोजती हूंजिनमें कोई भी आकृतिनहीं उभरती, मैं उन्हीं

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इश्क़ और बारिश…

इश्क का नशा औरबारिश की एक बूंद,दोनों एक से है।प्यार में बावरा मन औरठंडी हवाओं में झूमता वृक्ष,दोनों एक से हैं।आंखों में बसे मोहब्बत के वो हसीन सपने औरबारिश के स्पर्श से चमकते पेड़ों के वो पत्ते,दोनों एक से हैं।आशिकी की वो धुन औरखुले आसमानों में मचलते परिंदों का वो झुंड,दोनों एक से हैं।इश्क की

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चाहतों को मुख्तसर कर दिया…

सारी दुनियां से ही बेखबर कर दिया,उसने मुझपे ये कैसा असर कर दिया। कर दिया बूंद को वो समंदरऔर मेरी चाहतों को मुख्तसर कर दिया। जगाई है मुझमें ऐसी मुहब्बत,मुहब्बत को दिल का डगर कर दिया। जाने क्या बात उसमें थी,दिल को मेरे वो अपना घर कर दिया। उसमें दिखने लगा नूर रब का,हर दुआ

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रोटी सबसे बड़ी

मेरे भी कई ख्वाब थे,उन ख्वाबों मेंगगन को छू लेने जैसे अहसास थे पर,हकीकत की दुनिया बड़ी कठिन थीये भूख भी बड़ी जालिम निकलीवो रोटी जो सामने थी खड़ीकलम की ज़रूरत से थी बड़ी रोटी की खोज लेकर जहां जाती हैउम्र बहुत बड़ी हो जाती हैअक्सर रोटी की तलाश मेंप्रतिभाएं गुम हो जाती हैं ना

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