✍️ आकृति विज्ञा अर्पण

सवनी ई सुंदर फुहार पिया
मन भयो तोहार पिया ना…

अबकी आम के बगान
ओहि कजरी उठान

बही सावन गीत के फुहार पिया
मन भयो तहार पिया ना…

बड़की नीमिया के डार
देबो झूला एक डार

संग पेनिये उड़ईबो जवार पिया
मन भयो तोहार पिया ना…

लहके मेहंदी के डारि
रंग देली चटकारि

रंगे नाधब तोहरो दुलार पिया
मन भयो तोहार पिया ना…

कीनि द हरियर लुगरिया
झनकदार एक मुनरिया

गोरखपुर के टिकुलि नगदार पिया
मन भयो तोहार पिया ना…

(गोरखपुर की रहने वाली आकृति लोक साहित्य प्रेमी हैं और लोक गीत, कजरी आदि विधाओं को बेहतर तरीके से कलमबद्ध करती हैं। अपनी यह रचना इन्होंने UNBIASED INDIA के साथ साझा की है।)

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By Unbiased Desk

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