देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले एक मीडियाकर्मी का यह दर्द महसूस कीजिए जिसके परिवार में पत्नी, भाई और पापा इस समय कोरोना से जूझ रहे हैं। सिर्फ मीडियाकर्मी और उनकी मां ही निगेटिव पाए गए हैं।
त्रासदी देखिए कि परिवार के सदस्यों में कोरोना के लक्षण मिलने के बाद पहले तो जांच नहीं हो रही थी। एक बड़े चैनल में कार्यरत होने के बावजूद बहुत मशक्कत करनी पड़ी। कई वीडियो वायरल हुए और काफी दबाव पड़ा तब जांच हुई। जांच में परिवार के तीन सदस्य कोरोना पॉजिटिव पाए गए लेकिन अस्पताल में तब भी बेड नहीं मिला। अभी सभी घर पर ही हैं। पॉजिटिव होने के सात दिन बाद डॉक्टर पूछता है कोई लक्षण है? ओह, अब संवेदनहीनता—अव्यवस्था का कितना बड़ा लक्षण है!
 मीडियाकर्मी खुद और उनकी मां हर जोखिम उठाते हुए अपने परिवार की ढ़ाल बनकर खड़े हैं। आज देश में सबकुछ है— आजादी, लोकतंत्र, सरकार, व्यवस्था, अस्पताल लेकिन कुछ भी नहीं है। देश का हर नागरिक जैसे अकेला है। देश के ऐसे ही एक नागरिक और मीडियाकर्मी आशीष जैन की बातें बताती हैं कि कोरोना से ज्यादा डरावना देश में व्याप्त अव्यवस्था है, सरकारी संवेदनहीनता है!
परिवार के तीन सदस्यों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के नौवें दिन किसी तरह अपनी बात आशीष कह पाए हैं। पढ़िए—
✍️ आशीष जैन

बहुत दिनों के बाद लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। डॉक्टर का आज फोन आया वाइफ के पास। डॉक्टर भी स्क्रिप्ट वाली भाषा का यूज करने लगे हैं। कमर्शियल के जमाने मे पैकेजिंग का मामला है। यह कुछ वक्त के लिए सहानुभूति में मिलावट जैसा लगता है, गहरी सांसें लेते सरकारी तंत्र की यह अजीब सी प्रयोगशाला है। 7 दिन बाद डॉक्टर पॉज़िटिव आने के बाद आज पूछ रहे हैं कि क्या कोई सिम्टम्स हैं, कोई तकलीफ है? यह कैसी व्यवस्था है? कैसी लड़ाई है? यह तो कोरोना का मजाक है। सेल्फ आइसोलेशन का अर्थ इतना अव्यवहारिक कैसे हो सकता है?

यह यक्ष प्रश्न है कि क्या सरकारों ने कुछ नहीं किया? क्योंकि अगर खुद ही मुझे और मेरे परिवार को कोरोना से लड़ना था तो मुझे किसी व्यवस्था की क्या जरूरत? यह बात आप सभी को भी बार—बार समझ लेनी चाहिए और अपने अंदर के तहखाने में डाल लेनी चाहिए कि ये हालात किसी के साथ, कभी भी कहीं भी हो सकते हैं।

आप पत्रकार हैं तो हो सकता है अपना रसूख हो, प्रतिष्ठा हो, लेकिन सजग रहें कि अस्पतालों में पड़े हुए स्ट्रेचर सिर्फ नेताओं को आजकल पहचानते हैं। आपकी पत्रकारिता महामारी में, टर्म एन्ड कंडीशन के एक छोटे से स्टार जैसी है। खैर…

5 दिन बाद यह डायरी लिख रहा हूँ। मेरे घर से दो घर छोड़कर 22 साल की एक बच्ची की अकाल मृत्यु से आहत हूँ। बचपन से देखा था इस बच्ची को। उसका पूरा परिवार टूटा हुआ है। रुलाई के बीच तकलीफदेह यह था कि उसकी मौत कोरोना से होने की पुष्टि हुई और अंतिम संस्कार किसी और के हाथ मुमकिन था। मैं जानता था यह खबर पापा और परिवार के लिए दुखी करने वाली है। यह अचेत और असहज करने वाली बात है। उनके यहां 4 और पॉज़िटिव आए हैं। यानी, कोरोना भयंकर और भयावह रूप दिखा रहा था…।

इससे कुछ ही दूरी पर हमारा घर अब 9 दिन से कोरोना से लड़ रहा है। बहुत कुछ लिखने का दिल किया। दीदी की तेहरवीं भी हो गई, कोई नहीं गया। घर से कोई जाता भी कैसे? संक्रमण बहुत बुरा होता है। फैलाव ने समाज को तिनका—तिनका बिखेर दिया। आपको बता देता है यह कि बदनसीबी का दौर है।
सुबह 4 बजे आंख खुली थी। ऐसा आमतौर पर होता नहीं है। कई सवालों के साथ सोया था तो यह घबराहट में जवाब बना लाया और सुबह अजीब सी लग रही थी। आँखें मीचकर लेटा रहा। 6 बजे फिर उठा। माँ! वाकई मुद्दतो से सोई नहीं, जैसे आंखें बोझिल सी हो गई उनकी…। उनको आराम करने के लिए कई बार कहा। वो टाल देती हैं। मुझे अजीब से काम दे देती हैं।

यह सब आम नहीं है। मैं समझ सकता हूं कि रिश्तों को कैसे साथ लेकर चलना है। वैसे भी कोरोना ने बहुत कुछ सिखा दिया है। गिलोय का पानी और काढा आज साथ में दिया था। उसका कारण था हमें चक्कर कम लगते हैं और फिर दोनों ही चीज़ें तैयार थीं। आधे घंटे के बाद चाय और सैंडविच मैंने बना दिए थे। उसमें खीरे ज्यादा लगाए थे, क्योंकि मैंने पढ़ा है कि किसी भी रूप में यह रोगी को ज्यादा खिलानी है। 2 घण्टे का ब्रेक और फिर मां ने बच्चों को नहलाया। यह सबसे मुश्किल वाला काम है, लेकिन मां के पास इसके लिए जादुई नुस्खे है यानी ट्रिक्स हैं, कहानियां हैं, बच्चे मान जाते हैं। इसी बीच मैं फ्रूट का सलाद काट देता हूँ, जैसे अनानास, कीवी, चीकू और सेब। यह पौष्टिक है। डॉक्टर विश्वरूप जी को अगर आप सुनें तो बहुत लाभदायक विधि पता चल जाएंगी। सलाद सभी रोगियों को दे देते हैं। नींबू बहुत तेज़ करके क्योंकि विटामिन c होता है। सारा ज्ञान टेम्पलेट वाला है, जो या तो कोरोना से सही हुए लोगो से सूंघ कर लिया है या फिर यूट्यूब से।

घर में ही एक दूसरे को कई बार वीडियो कॉलिंग से यह समझने की कोशिश करते हैं कि शरीर में कोई हरकत या फिर कोई तकलीफ तो नहीं है। पापा को कल गले में दर्द हुआ था। यह डरता हुआ सत्य है कि यह दर्द बीते हुए आठ दिनों की मेहनत को बेकार कर सकता है। इसलिए, पापा को सलाह दी कि आप भांप अब ज्यादा बार लीजिए, ज्यादा देर तक लीजिए और काढा अब तीन बार, चाय 5 से 6 बार। अब यह नुस्खा काम कर रहा है। शाम आते— आते दर्द भाग गया और हमने राहत की सांस ली। पापा की उम्र ज्यादा है इसीलिए और डर रहता है। वैसे योग वो करते आए हैं बचपन से लेकिन योग वाले बीमार या संक्रमण का शिकार न हों, ऐसा कभी नहीं होता। आज पापा दर्द से निजात पा चुके हैं, लेकिन कमजोरी बहुत है। डॉक्टर केके अग्रवाल जी बताते हैं कि कोरोना डैमेज बहुत करता है। बस आप ख़ुराक लें, सहीं लें और पॉज़िटिव रहें।

बाकी बातें कल। लिखे हुए को दोबारा नहीं पढ़ रहा हूँ। बहुत थक गया हूं। व्याकरण दोष के लिए क्षमा करें।

हैप्पी कोरोना डेज़!

(आशीष जैन नई दिल्ली के एक मीडिया समूह में कार्यरत हैं और ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं। परिवार के कोरोना संक्रमित होने के बाद उन्होंने अपनी आपबीती UNBIASED INDIA के साथ साझा की है।)
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