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पीपल और गुलमोहरी का मौन प्रेम

 पीपल और गुलमोहरी का मौन प्रेम
✍️ अतुल तिवारी

आरी कुल्हाड़ी झेलती हुई गुलमोहरी का अस्तित्व आज नष्ट ही होने वाला था कि उसने पीपल से कहा सुनो ..मैं भी तुमसे प्रेम करती हूं। मेरे रंगीन रूप ने तुम्हें समझने में हमेशा अवरोध उत्पन्न किया। मैं अपनी मुग्ध मनोरमता के कारण तुम्हें पहचान न सकी। आज इतनी आसानी से टूटने पर मुझे एहसास हो रहा कि जाने कितनी आंधियों से तुमने मेरी मौजूदगी, मेरा सौंदर्य बचाये रखा। तुमने मुझसे इतना प्रेम क्यों किया?
वर्षो का सब्र समेटे पीपल आज विवश था, कुछ नही कर सकता था। आज शायद उसका रोना भी मुनासिब नहीं।
मैंने कई बार सोचा कि अपनी डालियां तुम तक भेजूं, सारे अधपके पीले पात तुम पर बिखेर दूं..तुम्हारी त्वचा की लिपियों पर अधिकार करूँ। तुम्हें अपनी छाया की ओट में रखूं मगर मेरी गुलमोहरी मुझे इसी बात का डर था कि हमारी निकटता लकड़हारे से देखी न जाएगी… जड़ खोदने में जरा भी देर न करेगा। तुम्हें मुक्त छोड़ तुम्हारी ओर झुके रहने में ही मेरी सार्थकता थी।
तुम पूछती हो न कि मैंने तुम्हे इतना प्रेम कैसे किया? तुम्हें याद नहीं पर मुझे मालूम है तुमने भी मुझसे हमेशा से प्रेम किया है। एक उम्र के बाद तुम्हारे चाहने वालों और मुझे पूजने वालों में इजाफा हुआ। हम दोनों का भटकाव लाजमी था। तुम्हें याद है वह माली जिसने हमें एक साथ लगाया? चरवाहे, बच्चे, मवेशी जाने कितनों ने प्रेम गढ़ा हमारी ओट में ।
हम पतझड़ में साथ झरे।
एक साथ भीगे और धुल कर हरे हुए।
एक साथ पक्षियों ने हमारे ऊपर तिनके रखे।
एक साथ हमने इंद्रधनुष देखा।
तारे तलाशे।
मुझे कैसे न तुमसे प्रेम होता?

मैंने हजारों मन्नतों के धागे और मनोकामनाएं सुनी..जिसमें अधिकांश धागे प्रेम के ही थे।
इन प्रार्थनाओं के एवज में मैंने सिर्फ तुम्हारी सलामती की दुआ मांगी।
मुझे तो परिजात की तरह रात में रोने का भी सुख नहीं। तुम्हारे प्रेम में मैंने कभी किसी विफल प्रेमी को खुद से झूलने नहीं दिया। हमेशा झूलों में झुलाया। मुझे पता है लकड़हारा मुझे छुएगा तक नहीं। मैं अभागा जाने क्यों पूजनीय कल्पवृक्ष बना दिया गया। किसी ने मेरे शरीर को जलावन के काबिल क्यों नहीं समझा।
गुलमोहरी निःशब्द ठूठ हो जाने को तैयार थी।
कितना कुछ कहने को उसके भीतर उमड़ रहा होगा। उसने फूलों से लकदक अपनी कोमल डालियां पीपल की ओर झुका दी। शांत। अक्षुब्ध। प्रथम और अंतिम आलिंगन।
गुलमोहरी!
मेरी साथी मेरी यह विशाल देह तुम्हारी स्मृतियों का जमघट है, तुम्हारे बाद मैं खुद को दीमकों के हवाले कर दूंगा।
गुलमोहर की जड़ से कीड़ों—मकोड़ों का पलायन देख लकड़हारा अचानक रुक गया। उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट गई।
उसे याद आया .. इसी गुलमोहरी का फूल चढ़ाकर उसने पीपल से अनेकों दुआएं मांगी थी। वह फूल का एक गुच्छा उठाकर पीपल को चढ़ा वापस मुड़ जाता है।

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