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नेपाल जैसा पड़ोसी नाराज है मतलब कुछ तो बात है…

 नेपाल जैसा पड़ोसी नाराज है मतलब कुछ तो बात है…

तस्वीर गवाह है… नेपाल नाराज है

किसी शख्स का पड़ोसी नाराज हो जाए तो कितनी बड़ी बात हो जाती है ना? कमाल है कि भारत जितने बड़े देश के तमाम पड़ोसी देश एक—एक कर नाराज होते जा रहे हैं और भारत की सरकार सबकुछ ठीक—ठाक बता रही है। सवाल है कि पड़ोसी इतने गुस्से में क्यों हैं? मान लिया जाए कि चीन की मंशा ठीक नहीं है तो फिर नेपाल क्यों नाराज है?

पड़ोसी की नाराजगी की वजह समझने के लिए सबसे पहले पड़ोसी को समझते हैं। दरअसल, भारत की सीमा सात देशों के साथ लगती है। इन सबमें अगर भारत से कोई सबसे करीब है, तो वह है नेपाल। इसे पड़ोसी देश से भी ज्यादा रिश्तेदार भी कह दें तो भी गलत नहीं होगा। नेपाल के साथ भारत के न सिर्फ व्यापारिक बल्कि सत्ता और सांस्कृतिक संबंध भी काफी घनिष्ठ हैं। लेकिन, इस समय दोनों पड़ोसी देशों के बीच काफी गलतफहमियां हो गई हैं। अपने-अपने देश के नक्शों को लेकर दोनों में झगड़ा शुरू हो गया है। यह भारत के लिए बड़ी मुसीबत है, क्योंकि भारत पहले से ही अपने एक पड़ोसी देश चीन के साथ लद्दाख में सीमा विवाद में उलझा हुआ है। नेपाल की संसद एक नया नक्शा पास करने जा रही है। जिसमें उन इलाकों को नेपाल का बताया गया है, जो नेपाल के प्रधानमंत्री के अनुसार भारत ने कब्जाए हैं। दोनों देशों और नागरिकों के बीच घनिष्ठ संबंध होने के बावजूद आखिर ऐसी क्या बात हो गई कि नेपाल को एक नया नक्शा पास करना पड़ा, और वह भारत के इतने खिलाफ हो गया है। आइए जानते हैं!

बात लगभग छह माह पुरानी है…

2 नवंबर 2019 को भारत ने एक नक्शा जारी किया क्योंकि, जम्मू-कश्मीर से अलग कर लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। भारत द्वारा लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को अलग-अलग दिखाए जाने के बाद नेपाल ने भारत के नक्शे को लेकर विरोध जताया। उसने कहा कि भारत ने हमारे कालापानी वाले इलाके को भी अपने नक्शे में दिखाया है। जो बिल्कुल गलत है, और इसे लेकर नेपाल में भारत के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

एक और मामला है…

विवाद की एक और वजह है। 8 मई 2020 को भारत के रक्षा मंत्री ने एक सड़क का उद्घाटन किया, जो विवादित क्षेत्र से होकर जाती है, और लिपुलेख तक पहुंचाती है। रक्षा मंत्री के अनुसार, इस सड़क का उद्देश्य कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों को सुविधा पहुंचाना था। नेपाल सरकार के अनुसार, लिपुलेख दर्रा नेपाल के क्षेत्र में आता है और इस पर सड़क बनाने से पहले भारत ने उससे कोई सलाह—मशविरा नहीं किया। वहीं, भारत का कहना है कि यह क्षेत्र भारत में आता है तो नेपाल से बात करने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। इसके कारण ही नेपाल की तरफ से टिप्पणियों का सिलसिला शुरू हो गया। नेपाल ने तो यहां तक कह डाला कि उसे अपनी सीमाओं की हिफाजत करनी आती है। यह एक तरह से भारत को खुली चेतावनी थी। अब नेपाल ने अपने नए नक्शे में भारत के हिस्से को भी अपना बता दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इसे लेकर संसद में संविधान संसोधन बिल भी पेश कर दिया है। इसके कारण दोनों देशों के बीच सरगर्मी और बढ़ गई है। लेकिन सही मायने में यह क्षेत्र किस देश का है…..यह जानने के लिए इसके इतिहास के बारे में जानना बेहद जरूरी है।

क्या कहता है इतिहास

आज से तकरीबन 200 साल पहले यानि की सन् 1800 ई. में नेपाल के शासक पृश्वी नारायण शाह नाम के गोरखा राजा थे। उन्होंने अपनी सीमाएं बढ़ानी शुरू की तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने विरोध जताया। इसे लेकर 1814 ई. में युद्ध भी हुए, जिसे एंग्लो-नेपाल युद्ध कहा जाता है। दो साल यानी 1816 तक युद्ध चलने के बाद नेपाल और ब्रिटिश के बीच मार्च 1816 में एक संधि हुई जिसे सुगौली संधि कहा जाता है। इसके तहत नेपाल ने सिक्किम और डार्जिलिंग वाले क्षेत्र से हाथ धो दिया लेकिन पश्चिम में भारत और नेपाल की सीमा एक नदी को माना गया। महाकाली नदी के पश्चिम का हिस्सा भारत का और पूर्व का नेपाल का तय किया गया, जिसकी बदौलत नेपाल को भारत का एक बड़ा हिस्सा हाथ लग गया। बता दें कि इस संधि के वक्त भारत और नेपाल की सीमा को लिम्पियाधूरा से निकलने वाली नदी को माना गया था, लेकिन 1879 में नक्शे में बदलाव किया गया और कालापानी वाली धारा को भारत-नेपाल की सीमा बताया गया। उसी के बाद से अब तक भारत उसी को सीमा मानता रहा है।

विवाद क्यों है?

1990 में नेपाल में लोकतंत्र आया तो वहां की सरकार ने लिम्पियाधूरा को भी अपने मानचित्र में दिखाना शुरू कर दिया, जो कि विवादित क्षेत्र है। इसके बाद से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने लगा। हालांकि कई बार इस विवाद को खत्म करने के लिए भारत ने पहल भी की। लेकिन, नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टी की सरकार ने इसे मानने से इनकार कर दिया। 2015 में हुए भारत-चीन व्यापार समझौते के तहत जब भारत ने कालापानी वाले इलाके को अपना बताया तो नेपाल और भड़क गया और उसने नाराजगी जाहिर की। अब हालत यह है कि सुगौली संधि को आधार बनाकर नेपाल भारत से लड़ रहा है, तो भारत का कहना है कि जब 1879 में मानचित्र में बदलाव किया गया तब नेपाल ने सवाल क्यों नहीं उठाए?

… तो अब क्या?

भारत और नेपाल के पास विवाद के अपने—अपने तर्क हैं तो सुलह और शांति के भी रास्ते जरूर होंगे। समझदारी तो यही कहती है कि पड़ोसियों से रिश्ते सही रखने चाहिए क्योंकि मुसीबत के समय वही सबसे पहले काम आते हैं। लेकिन, सवाल यह भी है कि क्या विवाद को सुलझाने वाली समझदारी नेपाल नहीं तो भारत के पास है?

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