इतिहास का वह काला दिन जब इंदिरा ने मीडिया पर लगाया सेंसर

विशेष

साल भले कितने भी आगे बढ़ जाएं पर कुछ तारीखें वहीं की वहीं रुक जाती हैं, कुछ ऐसा ही 28 जून के साथ भी है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए ये किसी काले दिन से कम नहीं। साल 1975 में तत्कालीन इंदिरा सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान न सिर्फ राजनीतिक विरोधियों और आंदोलकारियों की गतिविधियों पर पहरा बिठाया गया बल्कि प्रेस को भी सबसे कठोर सेंसरशिप से गुज़रना पड़ा। आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ था जब प्रेस अपना काम कर सकता था पर उसे हर ख़बर को प्रकाशित करने के लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। कहने को वो अपना काम कर सकता था, लेकिन उसे करना वही था जो सरकार चाहे या जिसके लिए तत्कालीन सरकार से मंज़ूरी मिले।

इतना ही नहीं-

• 3801 समाचार पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए।
• 327 पत्रकारों को मीसा के तहत बंद कर दिया गया।
• 290 अखबारों के विज्ञापन बंद हुए।
• टाइम और गार्जियन के समाचार प्रतिनिधियों को भारत से जाने का फरमान सुनाया गया।
• रॉयटर और दूसरी एजेंसियों के फोन और टेलेक्स के कनेक्शन काट दिए गए।

28 जून 1975, एक ऐसी तारीख में बदल चुकी है जिसका ज़िक्र जब भी होगा, याद आएगा कि किस तरह कलम किसी और की उंगलियों के इशारे पर चलने को मजबूर हुई थी और कैसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कर दिया गया था पाबंद।

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